अंग्रेज़ो के जमाने मे UPSC पास करने क बाद बने बाबा #खटखटा बाबा#जिलाधिकारी

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सप्रू साहब डिप्टी कलेक्टर

मनहर

अरब का सम्राट

बेगम

खटखटा बाबा

सप्रू साहब और मनहर संवाद, बातचीत, संभाषण, आलाप

ब्रिटिश शासन के जमाने कि बात है । इटावा में सप्रू साहब डिप्टी कलेक्टर थे । उनका नौकर था मनहर ।

एक रात भोजन करके सप्रू साहब चारपाई पर आराम कर रहे थे । मनहर पैर दबा रहा था ।

साहब बोले अरे मनहर कोई कहानी सुना ।

मनहर बोला साहब आपने बहुत सी किताब पढ़ी है और कहानियां सुनी है आप ही सुनाओ ।

साहब फिर बोले नहीं तू सुना मै सोते सोते सुनुगा ।

मनहर बोला वाह जी मै कहानी सुनाऊं और आप सो जाओ क्या मै ऐसे ही बकता रहूं ?

साहब बोले नहीं नहीं मै चाव से सूनुगा ।

अच्छा तो सुनो लेकिन हूं हूं करते रहना । मुझे पता चलते रहना चाहिए आप सुन रहे है । नहीं तो आप सो जाए और मै सुनाता रहू तो मेरी शक्ति ऐसे ही व्यर्थ चली जाएगी ।

“वाणी का जो संयम करता है उसकी वाणी का प्रभाव भी होता है । बिन जरूरी बोलना नहीं , बिन जरूरी सुनना नहीं ,बिन जरूरी देखना नहीं ,ऐसे मनुष्य की वाणी का ,मन का , बुद्धि का,जीवन का विशेष प्रभाव होता है ”

मनहर ने कहानी प्रारंभ की साहब जी तैयार हो जाइए कहानी सुनिए ।

राजा और दासी संवाद, बातचीत, संभाषण, आलाप

गर्मियों के दिन थे अरब का राजा अपने महल की छत शाही पलंग लगवा कर आराम किया करता था ।

केवड़े का छिड़काव किया जाता था सैया पर सुगंधित सुकोमल पुष्प बिछाए जाते थे पूनम की रात थी सोने का पलंग था रेशम की निवाड़ से भरा गया था कालीन बिछा था उस पर गद्दा बचा था फिर एक कालीन बिछा था उस पर सफेदी बिजी थी अगल-बगल 4 तकिए रखे थे

चांद की अमृत वर्षा हो रही थी पलंग सजाने वाली दासी ने पलंग सजाया दिनभर की थकी मारी थी बिस्तर सजा कर सोचा कि राजा साहब इस पर आराम फरमाते हैं उसको केवड़े की सुगंध आ रही है

चांद से शीतलता बरस रही मंद मंद पवन लहरा रहा है कितना मजा आता होगा राजा अभी भोजन करेंगे बाद में आएंगे तब तक जरा सा लेट कर देख लो दो-चार मिनट वह पलंग पर लेटी थकी तो थी पलंग पर पुष्पों की गुदगुदी के बड़े की सुगंध मंद मस्तानी हवा पूनम की चांदनी 3 मिनट भी नहीं बीते दादा सी सो गई
बादशाह भोजन करके आए देखा तो पलंग पर दासी जवानी हो सकता हो राज भाई वैभव वह कि सामग्री हो चापलूसी करने वाले लोगों फिर अहंकार को बाकी बचता भी क्या है

वह आग बबूला हो गया अपनी बेगम को बुलाया पूछा इस को क्या सजा देनी चाहिए जो तू कहेगी वह सजा दी जाएगी क्योंकि इसमें तेरा अपमान किया है तू ही फरमान कर इसको क्या सजा दी जाए दासी तो बेचारी वैसे थरथर कांप रही ही थी पसीने से तरबतर हो गई प्राण सभी को प्यारे होते हैं

प्राण बचाने के लिए वह दासी बादशाह राजा के कदमों में गिर पड़ी और रोने लगी जनसत्ता और युवक उसमें अहंकार मिलता है आदमी में क्रूरता भी आती है बादशाह सलामत की बेगम का अपमान बादशाह का अपमान

बादशाह के बिस्तर पर सोने की गुस्ताखी और फिर माफी हरगिज़ नहीं वैसे तो माल फसी की सजा होनी चाहिए लेकिन दया करते हैं बेगम तू ही सजा का फरमान दे बेगम ने कहा वह घंटा भर पलंग में सोई है 60 मिनट के साथ कोड़े फटकारे जाएं सात कोड़े कोई आदमी मारे तो वह बेचारी मारी जाए

ऐसा बादशाह सोच रहा था इतने में में बेगम ने कहा मैं ही अपने हाथ से इसको मारूंगी स्त्री है तो इसको मैं ही सजा दूंगी बेगम ने कोड़ा दे मारा दासी की पीठ पर 123 राजा गिनता रहा चार पांच कोडो में तो दासी गिर पड़ी बेगम साहिबा भी थक गई

बादशाह 12345 कहकर गिनती गिनने लगा 30 कोड़े तक दासी जोर-जोर से रोती रही परंतु इसके बाद दासी की मौत ही पलट गई वह 30 से 60 तक दासी को हस्ती रही वहां से भी कोई गहराई को छूकर आ रहा था कोई समझ की धारा से प्रकट हो रहा था

बादशाह ने पूछा पहले रोती थी और बाद में हंसने लगी क्या बात है जहांपनाह प्रारंभ में कीड़े लगे तो बहुत पीड़ा हो रही थी सोचा कि अब क्या करूं यह शरीर तो 1 दिन चलने वाला ही है थोड़े खा कर मर जाए मिठाई खाकर मरे इस मरने वाले शरीर को कोड़े लगते हैं किसी बाबा की वाणी सुनी थी वह याद आ गई सहनशक्ति आ गई सहनशक्ति आते ही ज्ञान की किरण मिली

कि मैं तो केवल 60 मिनट सोई हु और कोड़े लगे हैं लेकिन जो रोज सोते हैं रात भर सोते हैं उसको न जाने कितनी सजा होगी अच्छा कि मुझे अभी सजा मिल गई और मैं ऐसी आदत से बच गई अन्यथा मुझे भी आदत पड़ जाती मैं भी ऐसे पलंग की इच्छा कर दी केवड़े की सुगंध की पुष्पा दहिया की इच्छा कर अल्लाह की बंदगी की इच्छा नहीं होती
वह में विघ्न डालकर मेरे मालिक ने मुझे इबादत में प्रेरित कर दिया मैं यह सोचकर हंसी की सजा देने वाले को अपनी सजा की खबर ही नहीं है

इतना सुनते ही बादशाह की बुद्धि बदल गई बादशाह सब कुछ जामा फेंक दिया और जूते फेंककर फकीरी ली बादशाह आधी रात को ही वन गामी हो गया
मनहर नहीं है कहानी डिप्टी कलेक्टर साहब को सुनाएं फिर क्या हुआ फिर होगा क्या धीरज रखो सुनो फिर उस बादशाह ने खुदा की बंदगी की मालिक को याद किया जीवन धन्य किया


साहब जा तो रहे थे नींद में लेकिन सदा सदा के लिए उनकी नींद खुल गई
वह बोले मनहर तुमने बहुत अच्छा किस्सा कहा किंतु अब हमको भी इस चारपाई से उतरना चाहिए हम साढ़े ₹500 तनख्वाह पाते हैं जो गरीब है भूखे हैं नंगे हैं लाचार हैं थके हैं वादे हैं उनसे भी सरकार टैक्स लेकर हम को पगार देती है पीड़ित व्यक्तियों का पैसा लेकर मैं गिलाम गलीचे लगा रहा हूं मैं भी चैन की नींद लेकर

आयुष बर्बाद कर रहा हूं अब यह हरगिज़ नहीं होगा

मनहर कहता है

मनहर कहता है साहब क्या हो गया साहब बोले आज तूने बहुत बढ़िया कथा सुनाई साहब यह तो कहानी है नहीं नहीं यह सत्य घटना है अथवा सत्य को छूती हुई बात है शत्रु साहब पलंग से नीचे उतरे भूमि पर एक शादी चद्दर बिछाकर उस पर निंद्रा दिन हो गए दूसरे दिन सफरों साहब उठे अपनी डिप्टी कलेक्टर की पोस्ट का इस्तीफा लिख दिया पत्नी को मां कहकर पैर छू लिए बेटे से कहा तू भगवान का बेटा है अगले जन्म में किसी का बेटा था

इस जन्म के बाद भी न जाने किसका बेटा होगा बेटा बड़ा हो सुख दे यह मूर्खों की मान्यता है सुख तो अपनी समझ से अपनी तपस्या से होता है बेटे बड़े हो सुख दे ऐसी भावना से जो बेटों को पालते हैं उनको बुढ़ापे में दुख के सिवा और कुछ नहीं मिलता क्या इन हाड मास के पुत्रों से भगवान अनंत गुने शक्तिशाली नहीं है जो मिट्टी के पुतलों में भरोसा रखता है

और परमात्मा में भरोसा होता है उसको तो रोना ही पड़ता है मुझे बुढ़ापे में रोना पड़े उसके पहले ही मैं जीत गया अब तू जाने और तेरा काम जाने पढ़ो लिखो जो तुम्हारा प्रारंभ होगा वह मिलेगा उस समय इटावा जिले में एक अंग्रेज कलेक्टर थे और तीन डिप्टी कलेक्टर थे

उन सब ने सुना कि सप्रू साहब ने इस्तीफा दे दिया है अपने बंगले के बाद इमली के पेड़ के नीचे एक मात्र पटा कंबल लेकर पगली भेष में बैठ गए कलेक्टर डिप्टी कलेक्टर सुपरीटेंडेंट पुलिस कोतवाली सब उनको समझाने आए अंग्रेज कलेक्टर बोला अरे सब लोग तुम क्या करते हो फिर का भेष बनाया है फकीर बना है हां मेम साहब का क्या होगा लड़के का क्या होगा अभी सरकार की नौकरी करो 5 घंटे का फर्ज अदा करो बाकी समय में फकीरी करो का बड़ा हो जाए मेम साहब बूढ़ी हो जाए पेंशन मिलने लगे तब पूरे फकीर बनना

हम भी तुम्हारे साथ होकर बनेंगे राम-राम करेंगे तुम्हारे जैसे अमल दार का इस्तीफा हम नहीं लेते तुम लो चाहे ना लो मैं अब बंदों की गुलामी छोड़कर मालिक की गुलामी करूंगा तुम को रिझाने के बदले उसी को ही रह जाऊंगा उन्होंने बहुत समझाया


लेकिन अपने सफ़र की और बढ़ रहे अपने निर्णय में साथ वाले डिप्टी कलेक्टर ने अंग्रेज से कहा साहब कभी-कभी कुछ पुण्य की घड़ियां होती है तब बात लग जाती है और आदमी की जिंदगी बदल जाती है किसी पावन में एक लफ्ज़ भी लग जाए तो जीवन करवट ले लेता है अब इनकी राह बदल गई है

इनका मन काम से मुड़कर राम की ओर चल पड़ा है तुम्हारे हमारे समझाने से कुछ नहीं होगा
मेरा भाई बांदा जिले में तहसीलदार था वह नदी के किनारे कहीं जा रहा था नदी की उस हरियाली भूमि में एक शाम मेंढक को पकड़े हुए था मेंढक ट्रेन चिल्ला रहा था उसका आक्रांत सुनकर मेरा भाई घर आया और नौकरी से इस्तीफा दे दिया

बोला हम लोग भी काल के मुंह में पड़े हैं हमें भी काल ने पकड़ा ही है संसार के दुखों से करा रहे हैं फिर भी हम अपने को तहसीलदार मानते हैं वकील मानते हैं डॉक्टर मानते हैं इंजीनियर मानते हैं सेठ साहूकार मानते हैं धिक्कार है


ऐसे जीवन को मेरा भाई तहसीलदार ही छोड़कर फकीर हो गया अब पता नहीं कहां है गंगा किनारे हैं जमुना किनारे हैं नर्मदा किनारे किसी भी किनारे हो लेकिन मोक्ष के किनारे हैं शत्रु साहब को और भी उत्साह मिल गया


मेरे सामने साहब को बहुत समझाया नासमझ लोगों को समझाने का ठेका ले बैठते हैं यह सोए हुए लोगों की दुनिया है इसमें कोई जागता है तो फिर उसे सुलाने की कोशिश करते हैं लेकिन जिसको शब्द की चोट लग जाती है फिर वह नहीं सब सोए

जगने की यात्रा पर चलते रहे इटावा से दक्षिण दिशा में यमुना के किनारे पर अपना डेरा डाला हाथ में एक डंडा रखते थे मन लगता तो हरी का ध्यान स्मरण करते नहीं तो डंडे से कटक कटक करते थे अतः लोग उनको खटखटा बाबा कहने लगे 10:00 बजे के करीब डोली लेकर में भिक्षा लेने शहर में जाते थे पब्लिक उनको पहचानती तो थी

सब चाहते थे कि आज हमारे द्वार पर आए झोली में रोटी लेते थे और उस झोली को यमुनाजी में डूबा देते तदनंतर उस झोली को एक इमली की डाली पर लटका देते थे 4:00 बजे तक झोली लटकती रहती थी

फिर कि स्वयं खाते और बाकी बंदरों को खिला देते थे फटी कमली के सिवा कोई वस्त्र पास नहीं रखते थे इस प्रकार इटावा के उस डिप्टी कलेक्टर ने इटावा में ही 12 साल घोर तपस्या की एक बार इन खटखटा बाबा ने भंडारा किया कि की कमी पड़ गई कढ़ाई चढ़ी हुई थी शहर दूर था बाबा ने एक चेले से कहा कि दो कल से यमुना जल लाकर कढ़ाई में छोड़ दो वैसे ही किया गया यमुना का जल घी बन गया और पूरी तली गई

यमुना जी के भाव में पद्मासन में बैठे हुए कोई सिद्ध जा रहे थे उन्होंने कहा अरे

खट्टखटा

जरा पानी तो पिला दे खटखटा बाबा कमंडल में पानी लेकर यमुना जी में पानी पर चलते-चलते गए और शुद्ध को पानी पिलाया तब स्नेह का मैं भी सिद्ध और तुम भी सो गए बाबा की समाधि पर अब अनेक इमारतें बन गई हैं समाधि का मंदिर और विद्यापीठ की इमारत दर्शनीय साल में एक बार मेला लगता है भारत के विद्वानों योग्य और पंडितों को निमंत्रण देकर बुलाया जाता है खूब व्याख्यान होते हैं खटखटा बाबा की समाधि इटावा का तीर्थ स्थान है इटावा जिले का बच्चा-बच्चा उनका नाम जानता है ।