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Life journey with old and culture

Table of content बुजुर्ग :- युवा :- आम के पेड़ की साधना केवल पत्ते धारण करने तक ही सीमित नहीं रहती है उसकी साधना का लक्ष्य रसीले आम उसे अपना स

मन की शांति कैसे पाए
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बुजुर्ग :-
युवा :-
आम के पेड़ की साधना केवल पत्ते धारण करने तक ही सीमित नहीं रहती है उसकी साधना का लक्ष्य रसीले आम उसे अपना स्वयं श्रंगार करना रहता हैकिंतु रसीले आमों को पाकर वह इतराना इकलौता नहीं अपितु अपने समस्त अंगों को झुका कर लोगों को अपने फल बांटने के लिए नर्मदा पूर्वक लालायित रहता है

फल धारण कर उसे लोकार्पण करने का भाव केवल कुछ लोगों तक ही सीमित नहीं रहता अनेक बुजुर्ग अपनी उम्र का ढिंढोरा नहीं पीटते हुए अनेक बार रेगिस्तान में शीतल जल के स्रोत का काम भी करते हैं अपने अहम का एक ढक्कन उतार फेंकते हैं वह परिजनों के बीच जब जब गर्म हवा की लहर जलती है
बुजुर्ग :-
वह अपनी मधुर वाणी से उसावा में आद्रता पैदा करते हैं बुजुर्ग इस कड़ी में अपना परिवार के प्रति समर्पित भाव पैदा कर एक आनंद में वातावरण बनाने में सफल हो जाते हैं ऐसे ही बुजुर्गों के बलबूते पर हमारा भारतीय समाज हंस खेलता हुआ दिखाई देता है चंद सिरफिरे लोगों के क्रियाकलापों को अखबारों के बॉक्स में दिया जाता है
कितना अच्छा हो बॉक्स में उन लोगों का स्थान जोड़ दिया जाए जिन्होंने अपने परिवार की सीमाएं  संस्कारों की बागड़ लगाकर सुरक्षित रखी है अपने निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि उन बुजुर्गों ने अपनी कथनी और करनी में कभी अंतर नहीं रखा होगा उपदेशों की मैली चादर बिछा कर बैठना आसान है 
मगर उन उपदेशों को और ना अत्यंत कठिन है इस कठिन परी क्रिया के दौर से जो गुजर गुजर नहीं पाते उन्हें उपदेश का लबादा उतार कर फेंकना चाहिए परिवार के लिए वट वृक्ष की छाया के प्रतीक होते हैं मगर जिस पेड़ पर संस्कार के पत्ते नहीं होते में भला दूसरों को छाया कैसे दे सकते हैं 
संस्कारों की भट्टी की लीपना पहुंचना भी आवश्यक है इन सब फलों को धारण करके जो बुजुर्ग नम्रता पूर्वक जाता है उस नदी को बांस की लकड़ी के समान है जिस पर सब लहरी थप्पड़ मारती हैं तब झुक जाती है उन्हें अपना सिर ऊंचा कर खड़ी हो जाती है कथनी और करनी के बीच फासला जितना अधिक हो गा
 उस वर्ग के उपदेशों का ताना-बाना उतना ही गिरा हुआ होगा आज की युवा पीढ़ी को वक्त की मार बर्दाश्त करनी पड़ती है अर्थ तंत्र का पहिया थोड़ा सा भी उल्टा घूम जाता है तो वह परेशान हो जाता है ऐसे वक्त बुजुर्ग लकीर के फकीर बन कर पुराने रीति-रिवाजों की चादर ओढ़ने के लिए मजबूर नहीं करें
युवा :-
ऐसी रूढ़ीवादी परंपरा को कायम रखकर कंगाली की रेखा छूने के लिए वातावरण तैयार नहीं करें वर्तमान में धर्म के केंद्रों पर नौजवानों की आज तक नहीं रही है शिक्षा के चिंतन में युवा पीढ़ी की आडंबर और पाखंड से अवगत करा दिया है युवा पीढ़ी का मंदिरों के प्रति आकर्षण क्यों कमजोर हो गया यह बात भी सबसे बड़ी चोकने वाली है 
मेरा कहने का मतलब यह है कि मुख्य बात यह है बुजुर्गों को आज की युवा पीढ़ी को अपने धर्म विज्ञान का ज्ञान कराना चाहिए बॉडी माताओं को अपने घर की बहू पर अपने अधिकार जबरदस्ती तो अपने नहीं चाहिए बुजुर्गों को इनकार नहीं दिखाना चाहिए और जो आजकल के युवा हैं शिक्षा के साथ-साथ शिक्षा अच्छी तो शिक्षा ग्रहण करें 
लेकिन अपने धर्म का भी अच्छी तरह से ज्ञान ग्रहण करें और आपने कभी सुना होगा कभी-कभी एकदम गुस्से में आवेश में आकर युवा यह कर देते हैं युवा गंदे काम कर लेते हैं वह सब चीज गलत है युवाओं को शांति रखनी चाहिए हर एक चीज का क्योंकि हर समस्या का निवारण हो सकता है अगर आपके पास समस्या का निवारण ना हो तो
अपने बुजुर्ग से सलाह लें बुजुर्गों के पास जाएं बुजुर्गों को समझाएं वह आपकी हर समस्या का निवारण कर देंगे ठीक तो बुजुर्ग युवा युवती और स्त्रियां सभी एक ही चक्के के पहिए हैं सब आपस में एक दूसरे से परस्पर जुड़े हुए हैं सबको सबकी भावनाओं का ख्याल रखना चाहिए और घर परिवार में संस्कार का वातावरण बना रहे वैसे कर्म करने चाहिए

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