हिंदुस्तानी बाप

गढ़ा किरदार हमेसा खुद मे बहुत कुछ समेटे रखता है । किसी भी कहानी का भार उसका किरदार ही मे ही समेटा हुआ होता है। ऐसी ही कहानी मैं आज कहता हूँ लिखता हूँ। ये कहानी एक पिता की है। जिसकी जिंदगी उसको ऐसे मोड़ पर लाती है।तब वो अपने खून को नहीं उसको चुनता है जहाँ से उससे सम्मान मिलता है अपने जीवन के अंतिम पड़ाव पर। भारत मे एक सबसे बड़ा राज्य जनंसख्या की दृष्टि से है उत्तर प्रदेस जो अपने आप मे बहुत सी विविधताओं लोगो को समेटे हुए है। उत्तर प्रदेश मे लखनऊ समीप गाँव पड़ता है काशीपुर। वहाँ एक सज्जन मणि लाल रहा करते थें। मणि लाल खेती किया करते थें जिनसे उनका गुजारा बढ़िया चलता था। उनके पास अच्छी ख़ासी जमीन थी।उनके दो बेटे थें।अशोक और राजेश

मणि लाल ने अपने बच्चों को पढ़ाया लिखाया।और लेकिन शायद ठीक से परवरिश करना भूल गए।अपनी खेती के काम मे कभी भविष्य की चिंता ही नहीं की थी ।जमाना वक्त के साथ बड़ी तेजी से बदलता है।मणि लाल के बेटो की शादी हो गयी मणि लाल ने सारी संपत्ति अपने बेटो को देदी।और खुद अपने घेर(गाँव मे घर की बैठक) मे रहा करते थें।गाँव से 10 किलोमीटर दूर ही दूसरा गाँव था भगवानपुर।तो एक दिन भगवानपुर से एक कबाड़ का व्यपारी कबाड़ लेने काशीपुर मे आया जिसका नाम सुखलाल था।सुखलाल एक कबाड़ी व्यपारी थें जो खुद ही गाँव जाकर अपनी गाडी मे सामान जमा करते थें।भले आदमी थें।

सुखलाल जी काशीपुर पहुँच गए।और वहाँ हर गली मे जाकर चिल्लाने लगे अरे है कोई कबाड़ देने को जो काम मे नहीं है।कभी एक गली कभी दूसरी गली।उधर उसकी आवाज मणि लाल के कानो मे भी पड़ रही थी।एक तरफ दिन के 12 बज गए थें।मणि लाल को 2 बेटे होने के बावजूद भी सुबह की चाय के लिए भी घंटो इंतजार करना पड़ता था।जो मिलता था खा लेते थे।मुख्य बस अपना वक्त काट रहें थें।सुखलाल घूमता हुआ मणि लाल की बैठक मे आ पंहुचा और कहने लगा है क्या ताऊ जी कोई कबाड़ मणि लाल इतना कुछ कहते उनका पुत्र अशोक बोल पड़ा।

है कबाड़ लेगा तो बता । दाम बता क्या देगा

सुखलाल:- कबाड़ तो दिखा जरा क्या समान बेचना है तूने।

अशोक:- हमारे बाप को लेजा और इतना कह कर हँस दिया।

सुखलाल:- ला दे बता क्या मोल है ताऊ का।

अशोक:- देजा चार पांच हजार रूपये और क्या मोल लू इस बूढ़े का मैं।।

सुखलाल:ले पकड़ 5000

मणि सिंह: मैं मैं श्ब्द नही निकले सोचने लगे क्या बोई फसल मै।।। रे क्या बोई फसल मैं।।।मुझे ही काट खा गयी।।।

सुखलाल: चल ताऊ ।

अशोक:- अशोक बहुत खुश था 5 हजार जो मिले थें।

मणि सिंह:- चल भाई।

सुखलाल अपने घर पहुचते है।अपनी पत्नी को बुलाते है।घर से बहार सुखलाल की पत्नी जब बाहर आती है तो देखती है आज कबाड़ की जगह एक बूढ़ा आया था गाडी मे वो आश्चर्य से पूछती है स्वामी ये सज्जन कोन है।

सुखलाल बोलते है। तुम रोज कहती थी ना पिता जी नहीं है तो आज पिता लाया हूँ । स्वागत की तैयारी करो।ऐसे सुनते ही सुखलाल की पत्नी घर मे दौड़ी जाती है।और पूजा की थाली लेकर द्वार पहुचती है।

मणिलाल जी अचम्भी निगाहो से दोनों को देखते है।और कुछ नहीं बोलते। बस मन ही मन दोनों को आशीर्वाद देते है। मणिलाल जी ने सबसे पहले जलपान किया फिर नहा कर नए कपड़े पहने और आराम किया घर का पहला ही कमरा मणिलाल जी को मिला था।दिन गुजरते गए मणिलाल जी सोचते एक वो बेटे थे। एक ये बेटा है। एक वो बहुए थी।एक ये बहूँ है। मणिलाल जी ने अपने सुखलाल से कहा बेटा सारा दिवस खाली रहता हूँ। मुझे कुछ काम ही देदे अपनी दुकान पर खाली मन नही लगता है।सुखलाल जी ने चिंता भरे स्वर मे पूछा बाबा क्या तुम्हें कोई परेसानी है।अपने घर मे मणिलाल जी ने कहा नहीं परेसानी तो नहीं है।पर तू मेरी बहुत सेवा करता है। लेकिन आज से गाय भैस का दाना पानी मैं करूँगा।इतना सुनकर सुखलाल जी ने कहा ठीक है बाबा जैसी तुम्हारी मर्जी।

अब मणिलाल जी काम करते हुए गीत गाते थे।

क्या बोई फसल रे। जो मुझे ही काट लिया।।

बिन जन्मे ने जीवन को ठाट दिया।।

क्यों गुजरी ऐसी कहानी ।

सुख गया जो आँखों का पानी।।

क्या कहूँगा ऊपर जाकर।

जनो की जननी से।।

जो जन्मे थें उन्होंने ही काट लिया ।।

न जन्मे ने ठाट दिया।।

सुखलाल जी ने एक दिन बड़े ध्यान से सुना और मणिलाल से पूछा बाबा ये कोण सा भजन गाते हो आप। मणिलाल ने कहा नही रे मै तो बस यूँही गा लेता हूँ 2 अखर 2 जमात तक तो पढ़ा हूँ। ऐसा कहकर चुप हो जाता है।

उसी रात को मणिलाल जी अपने बिस्तर पर आराम कर रहें थे। उनके दिमाग मे एक बात आई मैं खा मखा उदास हुआ जाता हूँ मेरा इतना अच्छा पुत्र है। सुखलाल। मेरा बेटा तो सुखलाल ही है।क्यों ना मैं भी अपने पुत्र को अपनी बागडोर दू।मणिलाल ने उसी समय सुखलाल को बुलाया और कहा

रे सुख तू ही है मेरा।

जो मेरा वो है तेरा।।

सुखलाल मेरी जो काशीपुर मे जमीन है। वो मेरे ही तो नाम है।वो भी तो तेरी है। तू ही है मेरा पुत्र चल गाड़ी निकाल गाव के लोगो को ले और चल आज मेरे साथ तू जमीदार का बेटा है।

सुखलाल बोला नहीं पिता जी उस पर मेरा हक नहीं हैं।

आप मिले पिता का प्यार मिला।मुझे मेरा संसार मिला।। मणिलाल कहता है नहीं अगर तू नहीं जायेगा तो मैं यहाँ से हरिद्वार चला जाऊंगा तुझे छोड़कर ।

ऐसा सुनकर सुखलाल विवस हो जाता है और कहता है।चलो पिताजी ।मणिलाल तहसिल पहुचता है। सारी जमीन सुखलाल के नाम कर देता है।और फिर कहता है चल गाव काशीपुर चल।

सर पर पगड़ी लगी हुई हाथ मे खुली सुखलाल की गाड़ी मे आगे बैठा हुआ मणिलाल राजा की माफिक लगता है। और अपने खेतो मे पहुचता है।और सुखलाल से कहता हैं बेटा ये जो सामने खेत है ये तेरे है। इनमे जो फसल बोई हुई है। उन पर ट्रेक्टर चला दे ये हमारी नहीं। हम तो अपनी बोयेंगे सुखलाल ट्रैक्टर फिरवा देता है। सारी फसल पर इतने मैं गाँव का कोई आदमी भागा हुआ अशोक और राजेश के पास जाता है जल्दी चलो पता नहीं कोई पगड़ी मे एक बड़ा आदमी सा लगता है आया हुआ है और तुम्हारे खेतो मे ट्रैक्टर चलवा रह है। सारी फसल खराब कर दी ।

ऐसा सुनकर राजेश और अशोक खेतो की तरफ भागते है। तो क्या देखते है। एक बूढ़ा आदमी जी काया से है।पर जोश उसका बूढ़ा नहीं लगता है। ट्रैक्टर को आदेश दे रहा है। खेत मे एक बीज का दाना ना रहें। धरती आज नई करदो फिर से फसल बोनी है।अशोक और राजेश आवाज देते है।

अरे कौन हो तुम हमारी जमीन पर क्या कर रहैं हो

फिर मणिलाल उनकी तरफ घूमता है।और कहता है।किसकी जमीन ।।

अशोक और राजेश :- दोनों चौक जाते है कहते है।पिताजी जी आप।

मणिलाल:- कौन पिताजी बन्धुओं।

अशोक और राजेश :- ऐसा मत कहिये पिताजी हम आपके बेटे है।

मणिलाल: मेरा बेटा तो वो तो खड़ा है।

ये द्र्श्य सभी गाँव वाले देखते है। और मन ही मन सोचते है। जो भी हो रहा है सही हो रहा है।

फिर अपनी जमीन पर कब्ज़ा लेकर मणिलाल जी सुखलाल को कहते है चल बेटा सुख अब घर चल यहाँ का आज का काम खत्म।

मणिलाल और सुखलाल घर आ जाते है।

फिर नए दिन सुखलाल जी के कानो मे आवाज आती है।

जो बोई फसल उसने ही ।

ठाट दिया ।।।

देखा फ़ीर ताऊ का कमाल